
By reciting the Goddess’s stotra, all your wishes and desires are fulfilled. If you chant this stotra daily, it destroys all your enemies. Whoever tries to bring any kind of trouble or harm upon you — by regularly reciting this stotra, all those obstacles and dangers are removed by the blessings of the Divine Mother.
Īśvara uvāca — The Lord said:
1.
Oṁ Dhumāvatī Dhumravarṇā Dhumrapānaparāyaṇā ।
Dhumrākṣamathinī Dhanyā Dhanyasthānanivāsinī ॥
Meaning– Salutations to Dhumavati, who has a smoky complexion, delights in the smoke essence, destroys smoky darkness, and dwells in sacred auspicious places.
2.
Aghorācārasaṁtuṣṭā Aghorācāramaṇḍitā ।
Aghoramantrasaṁprītā Aghoramantrapūjitā ॥
Meaning– She is pleased by the path of Aghora (the fearless), adorned by Aghora practices, delighted by Aghora mantras, and worshipped through Aghora rites.
3.
Aṭṭāṭṭahāsaniratā Malināmbaradhāriṇī ।
Vṛddhā Virūpā Vidhavā Vidyā Ca Viraladvijā ॥
Meaning– She roars with loud laughter, wears tattered clothes, appears aged and formless, is the widow form of Shakti, and grants rare spiritual knowledge.
4.
Pravṛddhaghoṇā Kumukhī Kuṭilā Kuṭilekṣaṇā ।
Karālī Ca Karālāsyā Kaṅkālī Śūrpadhāriṇī ॥
Meaning– With a sharp nose and fierce eyes, terrifying face and form, she holds a winnowing basket and embodies the skeletal aspect of existence.
5.
Kākadhvajarathārūḍhā Kevalā Kaṭhinā Kuhūḥ ।
Kṣutpipāsārditā Nityā Lalajjihvā Digambarī ॥
Meaning– Riding on a chariot marked with a crow, she is self-existent, austere, ever-hungry and thirsty, with a red tongue and clothed only in the directions (naked truth).
6.
Dīrghodarī Dīrgharavā Dīrghāṅgī Dīrghamastakā ।
Vimuktakuṁtalā Kīrtyā Kailāsasthānavāsinī ॥
Meaning– With a long belly, loud voice, tall body and unbound hair, her fame pervades, and she dwells in the divine realm of Kailasa.
7.
Krūrā Kālasvarūpā Ca Kālacakrapravartinī ।
Vivarṇā Cañcalā Duṣṭā Duṣṭavidhvaṁsakāriṇī ॥
Meaning– Fierce and representing Time itself, she turns the wheel of destiny, pale, restless, destroyer of evil and wickedness.
8.
Caṇḍī Caṇḍasvarūpā Ca Cāmuṇḍā Caṇḍaniḥswanā ।
Caṇḍavegā Caṇḍagatiś Caṇḍamuṇḍavināśinī ॥
Meaning– She is Chandi, of fierce nature and sound, with quick movement, mighty stride, and destroyer of Chanda and Munda demons.
9.
Cāṇḍālinī Citrarekha Citrāṅgī Citrarūpiṇī ।
Kṛṣṇā Kapardinī Kullā Kṛṣṇārūpā Kriyāvatī ॥
Meaning– The outcaste energy, marked with divine patterns, dark-complexioned, with matted hair, manifesting as the active force of karma (action).
10.
Kuṁbhastanī Mahonmattā Madirāpānavihvalā ।
Caturbhujā Lalajjihvā Śatrusaṁhārakāriṇī ॥
Meaning– With full breasts symbolizing nourishment, intoxicated by divine wine, four-armed, red-tongued, she destroys the enemies of her devotees.
11.
Śavārūḍhā Śavagatā Śmaśānasthānavāsinī ।
Durārādhyā Durācārā Durjanaprītidāyinī ॥
Meaning– Riding upon a corpse, dwelling in cremation grounds, hard to please, transcending norms, and granting favor to the humble and rejected.
12.
Nirmāṁsā Ca Nirākārā Dhumahastā Varānvitā ।
Kalahā Ca Kaliprītā Kalikalmaṣanāśinī ॥
Meaning– Without flesh (beyond form), formless, holding smoke in her hand, giver of boons, fond of Kali Yuga yet destroyer of its evils.
13.
Mahākālasvarūpā Ca Mahākālaprapūjitā ।
Mahādevapriyā Medhā Mahāsaṅkaṭanāśinī ॥
Meaning– The very form of Mahakala (Time), adored by Him, beloved of Mahadeva (Shiva), full of wisdom, destroyer of great calamities.
14.
Bhaktapriyā Bhaktagatir Bhaktaśatruvināśinī ।
Bhairavī Bhuvanā Bhīmā Bhāratī Bhuvanātmikā ॥
Meaning– She is dear to devotees, their ultimate refuge, destroyer of their foes; Bhairavi, the essence of all worlds and knowledge.
15.
Bheruṇḍā Bhīmanayanā Trinetra Bahurūpiṇī ।
Trilokeśī Trikālajñā Trisvarūpā Trayītanuh ॥
Meaning– She is Bherunda (terrible), with fierce eyes and three eyes, many-formed, ruler of the three worlds, knower of past, present, and future, embodying the triple energies.
16.
Trimūrtiś Ca Tathā Tanvī Triśaktiś Ca Triśūlinī ।
Iti Dhumāmahat Stotraṁ Nāmnāmaṣṭaśatātmakam ॥
Meaning– She is the Trimurti (three forms), subtle, the three Shaktis, wielder of the trident. Thus ends the great hymn containing her 108 names.
17–19 (Phalaśruti — Fruits of Recitation)
Mayā te kathitaṁ devi śatrusaṅghavināśanam ।
Kārāgāre ripugraste mahotpāte mahābhaye ॥
Meaning– O Devi, by reciting these names, all enemies are destroyed, even when one is imprisoned or surrounded by great dangers.
Idaṁ stotraṁ paṭhen martyah mucyate sarvasaṅkaṭaiḥ ।
Guhyād guhyataraṁ guhyaṁ gopanīyaṁ prayatnataḥ ॥
Meaning– Whoever recites this most secret hymn is freed from all troubles. It must be kept sacred and recited with devotion.
Catuṣpadārthadaṁ nṛṇāṁ sarvasaṁpattpradāyakam ॥
Meaning– It grants the four puruṣārthas (Dharma, Artha, Kāma, Mokṣa) and bestows every prosperity.
श्री धूमावती अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्
श्री धूमावती अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्
देवी के स्तोत्र का पाठ करने से आपकी सभी मनोकामनाएँ और इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। यदि आप इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करते हैं, तो यह आपके सभी शत्रुओं का नाश कर देता है। जो भी व्यक्ति आपके ऊपर किसी भी प्रकार का संकट या हानि लाने की कोशिश करता है — माँ के इस स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करने से उनके सभी संकट और बाधाएँ देवी माँ की कृपा से दूर हो जाती हैं।
ईश्वर उवाच — भगवान बोले :
१.
ॐ धूमावती धूम्रवर्णा धूम्रपानपरायणा ।
धूम्राक्षमथिनी धन्या धन्यस्थाननिवासिनी ॥
भावार्थ (अर्थ): देवी धूमावती धुएँ के समान वर्ण वाली हैं, धुएँ का सेवन करने वाली, धूम रूप अंधकार का नाश करने वाली तथा शुभ स्थानों में निवास करने वाली हैं।
२.
अघोराचारसंतुष्टा अघोराचारमंडिता ।
अघोरमंत्रसंप्रिता अघोरमंत्रपूजिता ॥
भावार्थ (अर्थ): अघोर साधना से प्रसन्न होती हैं, अघोराचार से शोभित हैं, अघोर मंत्रों से प्रिय हैं और उन्हीं मंत्रों द्वारा पूजित होती हैं।
३.
अट्टहासनिरता मलिनाम्बरधारिणी ।
वृद्धा विरूपा विधवा विद्या च विरलद्विजा ॥
भावार्थ (अर्थ):देवी अट्टहास करती रहती हैं, मैले वस्त्र धारण करती हैं, वृद्ध रूप में विराजमान, विधवा स्वरूपा और दुर्लभ ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं।
४.
प्रवृद्धघोणा कुमुखी कुटिला कुटिलाक्षणा ।
कराली च करालास्या कंकाली शूर्पधारिणी ॥
भावार्थ (अर्थ): तीव्र नासिका वाली, विकृत मुख वाली, भयावह दंतों की स्वामिनी, अस्थि-कंकाल से युक्त, और सूप (झाड़न) धारण करने वाली हैं।
५.
काकध्वजरथारूढा केवला कठिना कुहुः ।
क्षुत्पिपासार्दिता नित्या ललज्जिह्वा दिगम्बरी ॥
भावार्थ (अर्थ):काकध्वज (कौए के ध्वज) वाले रथ पर आरूढ़, नित्य स्वरूपा, कठोर, सदैव भूख-प्यास से पीड़ित, लाल जिह्वा वाली और दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं।
६.
दीर्घोदरी दीर्घरवा दीर्घांगी दीर्घमस्तका ।
विमुक्तकुंतला कीर्त्या कैलासस्थानवासिनी ॥
भावार्थ (अर्थ): लंबी देह, दीर्घ ग्रीवा, लम्बा मुख, खुले बालों वाली, यशस्विनी और कैलास में निवास करने वाली हैं।
७.
क्रूरा कालस्वरूपा च कालचक्रप्रवर्तिनी ।
विवर्णा चंचला दुष्टा दुष्टविध्वंसकारिणी ॥
👉 अत्यंत क्रूर, कालस्वरूपा, कालचक्र को चलाने वाली, विवर्ण (पीतवर्ण), चंचला और दुष्टों का नाश करने वाली हैं।
८.
चण्डी चण्डस्वरूपा च चामुण्डा चण्डनिःस्वना ।
चण्डवेगा चण्डगतिश्चण्डमुंडविनाशिनी ॥
भावार्थ (अर्थ): चण्डी स्वरूपा, प्रचण्ड स्वर की अधिष्ठात्री, चामुण्डा रूपिणी, तीव्र गति और चण्ड-मुंड राक्षसों का नाश करने वाली हैं।
९.
चाण्डालिनी चित्ररेखा चित्रांगी चित्ररूपिणी ।
कृष्णा कपर्दिनी कुल्ला कृष्णारूपा क्रियावती ॥
भावार्थ (अर्थ):चाण्डालिनी (अन्त्यजा शक्ति), चित्राङ्गी, विविध रूपों वाली, कृष्णवर्णा, जटाधारी और कर्मशक्ति स्वरूपा हैं।
१०.
कुंभस्तनी महोन्मत्ता मदिरापानविह्वला ।
चतुर्भुजा ललज्जिह्वा शत्रुसंहारकारिणी ॥
भावार्थ (अर्थ):पूर्ण स्तन वाली, अत्यन्त उन्मत्त, मदिरा के प्रभाव से विमोहित, चतुर्भुजा, लाल जिह्वा वाली और शत्रुनाशिनी हैं।
११.
शवारूढा शवगता श्मशानस्थानवासिनी ।
दुराराध्या दुराचारा दुर्जनप्रीतिदायिनी ॥
भावार्थ (अर्थ):शव पर आरूढ़, शव रूप में स्थित, श्मशान में निवास करने वाली, कठिन आराध्य, और दुष्टजनों को भी मोक्षमार्ग देने वाली हैं।
१२.
निर्मांसा च निराकारा धूमहस्ता वरान्विता ।
कलहा च कलीप्रीता कलिकल्मषनाशिनी ॥
भावार्थ (अर्थ):निराकार, मांसहीन, हाथ में धूम का रूप, वर प्रदान करने वाली, कलह की अधिष्ठात्री, परंतु कलियुग के दोषों का नाश करने वाली हैं।
१३.
महाकालस्वरूपा च महाकालप्रपूजिता ।
महादेवी प्रिया मेधा महासंकटनाशिनी ॥
भावार्थ (अर्थ): महाकाल स्वरूपा, महाकाल द्वारा पूजिता, महादेव की प्रिय, ज्ञानस्वरूपा और महा संकटों का नाश करने वाली हैं।
१४.
भक्तप्रिया भक्तगतिर् भक्तशत्रुविनाशिनी ।
भैरवी भुवना भीमा भारती भुवनात्मिका ॥
भावार्थ (अर्थ): भक्तों की प्रिय, भक्तों की गति, भक्त शत्रुओं का नाश करने वाली, भैरवी स्वरूपा, भुवनात्मिका और ज्ञानमयी हैं।
१५.
भेरुण्डा भीमनयना त्रिनेत्रा बहुरूपिणी ।
त्रिलोकेशी त्रिकालज्ञा त्रिस्वरूपा त्रयीतनुः ॥
भावार्थ (अर्थ):भीषण नेत्रों वाली, त्रिनेत्री, अनेक रूपों में प्रकट, त्रिलोक की ईश्वरी, त्रिकालज्ञा और वेदत्रयी की देहस्वरूपा हैं।
१६.
त्रिमूर्तिश्च तथा तन्वी त्रिशक्तिश्च त्रिशूलिनी ।
इति धूमामहत् स्तोत्रं नाम्नामष्टशतात्मकम् ॥
भावार्थ (अर्थ):त्रिमूर्ति स्वरूपिणी, कोमल, त्रिशक्ति स्वरूपा और त्रिशूल धारण करने वाली हैं।
इस प्रकार यह १०८ नामों वाला धूमावती महास्तोत्र समाप्त होता है।
१७–१९ (फलश्रुति – फल का वर्णन)
मया ते कथितं देवि शत्रुसंघविनाशनम् ।
कारागारे रिपुग्रस्ते महोत्पाते महाभये ॥
भावार्थ (अर्थ): हे देवी! इस स्तोत्र का पाठ शत्रु, कारागार, विपत्ति और भय से मुक्ति देता है।
इदं स्तोत्रं पठेन्मर्त्यो मुच्यते सर्वसंकटैः ।
गुह्याद् गुह्यतरं गुह्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥
भावार्थ (अर्थ):जो मनुष्य इस गोपनीय स्तोत्र का पाठ करता है, वह सब संकटों से मुक्त होता है। इसे गोपनीय रखकर श्रद्धा से जप करना चाहिए।
चतुष्पदार्थदं नृणां सर्वसंपत्प्रदायकम् ॥
भावार्थ (अर्थ):यह स्तोत्र धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों पुरुषार्थ और सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करता है।
समापन:
इति श्रीधूमावत्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥