
Maa Varahi Devi is the goddess with the face of a boar — considered the female form of Lord Vishnu’s Varaha (Boar) Avatar.
She is as powerful and influential as Maa Baglamukhi, Maa Kamakhya, and Maa Dhumavati.
By worshipping Her, one attains control over the mind, inner beauty, charm, and great prosperity.
Maa Varahi is worshipped especially at night, as She is a goddess of divine and mystical energy.
If the Divine Mother becomes pleased with you, She blesses you with fame, comfort, success, and a prosperous life.
Her true devotees worship Her during the night through deep meditation and devotion.
By reciting Maa Varahi’s sacred Kavach (protective hymn), the devotee becomes free from all fear of enemies,and their heart naturally fills with love, faith, and deep devotion.
Shri Varahi Kavacham
Asya Shri Varahi Kavachasya Trilochana Rishih, Anushtub Chhandah, Shri Varahi Devata, Om Bijam, Gloum Shaktih, Swaha Iti Keelakam, Mama Sarva Shatrunashanarthe Jape Viniyogah.
Dhyanam
Dhyatwendraneelavarnabhaam Chandrasuryagnilochanaam,
Vidhivishnuharendraadi Maturbhairavasevitaam. ॥ 1 ॥
Jwalanmaniganaprokta Makutamavilambitaam,
Astrashastrani Sarvani Tattat Karyochitani Cha. ॥ 2 ॥
Etaih Samastairvividhham Bibhrateem Musalam Halam,
Patva Hinsran Hi Kavacham Bhuktimuktiphalapradam. ॥ 3 ॥
Pathetttrisandhyam Rakshartham Ghorashatrunivrittidam,
Vartali Me Shirah Patu Ghorahi Phalamuttamam. ॥ 4 ॥
Netre Varahavadanā Patu Karṇau Tatha Anjanee,
Ghraanam Me Rundhinee Patu Mukham Me Patu Jambhine. ॥ 5 ॥
Patu Me Mohinee Jihvaam Stambhine Kanthamadarat,
Skandhau Me Panchamee Patu Bhujau Mahishavahana. ॥ 6 ॥
Simhaarudha Karau Patu Kuchau Krishnamruganchitaa,
Nabhim Cha Shankhine Patu Prishthadeshe Tu Chakrinee. ॥ 7 ॥
Khadvam Patu Cha Katyaam Me Medhram Patu Cha Khedinee,
Gudam Me Krodhinee Patu Jaghanam Stambhine Tatha. ॥ 8 ॥
Chandochchandash Choruyugmam Janune Shatrumardinee,
Janghadwayam Bhadrakaalee Mahakaalee Cha Gulphayoh. ॥ 9 ॥
Padadyanguliparyantam Patu Cha Unmattabhairavee,
Sarvangam Me Sadaa Patu Kalasankarshanee Tatha. ॥ 10 ॥
Yuktaayuktasthitam Nityam Sarvapapat Pramuchyate,
Sarve Samarthya Samyuktam Bhakta Rakshanatatparam. ॥ 11 ॥
Samastadevataa Sarvam Swayam Vishnoh Puraardhane,
Sarvashatruvinaashaaya Shoolina Nirmritam Puraa. ॥ 12 ॥
Sarvabhaktajanaashritya Sarvavidvesha Samhatih,
Varahi Kavacham Nityam Trisandhyam Yah Pathennarah. ॥ 13 ॥
Tathaa Vidham Bhootagana Na Sprushanti Kadaachana,
Aapadah Shatruchoraadi Grahadoshaashcha Sambhavaah. ॥ 14 ॥
Maataa Putram Yathaa Vatsam Dhenuh Pakshmeva Lochanam,
Tathaangameva Varaahii Rakshaa Rakshati Sarvadaa. ॥ 15 ॥
Iti Shri Rudrayamalatantrae Shri Varahi Kavacham Samaptam.
श्री वाराही कवचम्
माँ वाराही देवी एक वराहमुखी देवी हैं — जिन्हें भगवान विष्णु के वराह अवतार का स्त्री रूप माना जाता है।
वे माँ बगलामुखी, माँ कामाख्या और माँ धूमावती की तरह ही अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली देवी हैं।
माँ वाराही की उपासना करने से मन पर नियंत्रण, आंतरिक सौंदर्य, आकर्षण और अपार समृद्धि प्राप्त होती है।
माँ वाराही की पूजा विशेष रूप से रात्रिकाल में की जाती है, क्योंकि वे दिव्य और रहस्यमयी ऊर्जा की अधिष्ठात्री देवी हैं।
यदि माँ आप पर प्रसन्न हो जाएँ, तो वे आपको यश, सुख, सफलता और समृद्ध जीवन का वरदान देती हैं।
उनके सच्चे भक्त रात्रि के समय गहन ध्यान और भक्ति के साथ उनकी उपासना करते हैं।
माँ वाराही के पवित्र कवच का पाठ करने से भक्त शत्रु भय से मुक्त हो जाता है,
और उसके हृदय में प्रेम, श्रद्धा और गहन भक्ति का भाव अपने आप उत्पन्न हो जाता है।
अस्य श्रीवाराही कवचस्य त्रिलोचन ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीवाराही देवता, ॐ बीजं, ग्लौं शक्ति, स्वाहा इति कीलकं, मम सर्वशत्रुनाशनार्थे जपे विनियोगः ॥
इस कवच का ऋषि (प्रवर्तक) त्रिलोचन हैं, छन्द ‘अनुष्टुप्’ है, देवता देवी श्री वाराही हैं।
‘ॐ’ बीज है, ‘ग्लौं’ शक्ति है, ‘स्वाहा’ कीलक है।
यह जप मेरे समस्त शत्रुओं के नाश के लिए किया जाता है।
ध्यानम् (Devi Varahi Dhyana — ध्यान श्लोक)
ध्यात्वेन्द्रनीलवर्णाभां चन्द्रसूर्याग्निलोचनाम् ।
विधिविष्णुहरेन्द्रादि मातृभैरवसेविताम् ॥ 1 ॥
भावार्थ:
देवी वाराही का ध्यान इस प्रकार करें —
वह इन्द्रनील मणि के समान नीलवर्ण की हैं,
उनके तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान चमकते हैं,
और उनकी सेवा ब्रह्मा, विष्णु, हर (शिव), इन्द्र, मातृगण तथा भैरव करते हैं।
ज्वलन्मणिगणप्रोक्तमकुटामाविलम्बिताम् ।
अस्त्रशस्त्राणि सर्वाणि तत्तत्कार्यॊचितानि च ॥ 2 ॥
भावार्थ:
देवी वाराही ज्वलन्त मणियों से जड़ा मुकुट धारण करती हैं,
और वे अपने कार्यानुसार विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।
एतैः समस्तैर्विविधं बिभ्रतीं मुसलं हलम् ।
पात्वा हिंस्रान्हि कवचं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ 3 ॥
भावार्थ:
वे हल और मुसल जैसे अस्त्र धारण करती हैं।
यह कवच भक्तों के शत्रुओं का नाश करता है
और भक्ति व मुक्ति — दोनों का फल प्रदान करता है।
पठेत्रिसंध्यं रक्षार्थं घोरशत्रुनिवृत्तिदम् ।
वार्ताली मे शिरः पातु घोराही फालमुत्तमम् ॥ 4 ॥
भावार्थ:
जो इस कवच का त्रिकाल (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ करता है,
उसे भयंकर शत्रुओं से रक्षा प्राप्त होती है।
वार्ताली देवी मेरे सिर की रक्षा करें
और घोराही देवी मेरे ललाट की रक्षा करें।
नेत्रे वराहवदना पातु कर्णौ तथा अञ्जनी ।
घ्राणं मे रुन्धिनी पातु मुखं मे पातु जम्भिनी ॥ 5 ॥
भावार्थ:
वराहमुखी देवी मेरे नेत्रों की रक्षा करें,
अंजनी देवी मेरे कानों की रक्षा करें,
रुंधिनी देवी मेरी नासिका की रक्षा करें,
और जम्भिनी देवी मेरे मुख की रक्षा करें।
पातु मे मोहिनी जिह्वां स्तम्भिनी कण्ठमादरात् ।
स्कन्धौ मे पञ्चमी पातु भुजौ महिषवाहना ॥ 6 ॥
भावार्थ:
मोहिनी देवी मेरी जिह्वा की रक्षा करें,
स्तम्भिनी देवी मेरे कण्ठ की रक्षा करें,
पञ्चमी देवी मेरे दोनों कंधों की रक्षा करें,
और महिषवाहना देवी मेरी भुजाओं की रक्षा करें।
सिंहारूढा करौ पातु कुचौ कृष्णमृगाञ्चिता ।
नाभिं च शङ्खिनी पातु पृष्ठदेशे तु चक्रिणी ॥ 7 ॥
भावार्थ:
सिंह पर आरूढ़ देवी मेरे हाथों की रक्षा करें,
कृष्णमृग की रेखाओं से सुशोभित देवी मेरे वक्षस्थल की रक्षा करें,
शंखिनी देवी मेरी नाभि की रक्षा करें,
और चक्रिणी देवी मेरी पीठ की रक्षा करें।
खड्गं पातु च कट्यां मे मेढ्रं पातु च खेदिनी ।
गुदं मे क्रोधिनी पातु जघनं स्तम्भिनी तथा ॥ 8 ॥
भावार्थ:
खड्गधारिणी देवी मेरी कटि (कमर) की रक्षा करें,
खेदिनी देवी मेरे गुप्तांग की रक्षा करें,
क्रोधिनी देवी मेरे गुदा की रक्षा करें,
और स्तम्भिनी देवी मेरे जघन भाग की रक्षा करें।
चण्डोच्चण्डश्चोरुयुग्मं जानुनी शत्रुमर्दिनी ।
जङ्घाद्वयं भद्रकाली महाकाली च गुल्फयोः ॥ 9 ॥
भावार्थ:
चण्ड और उग्र रूपिणी देवी मेरे दोनों घुटनों की रक्षा करें,
शत्रुमर्दिनी देवी मेरी जंघाओं की रक्षा करें,
भद्रकाली और महाकाली देवी मेरे टखनों की रक्षा करें।
पादाद्यङ्गुलिपर्यन्तं पातु चोन्मत्तभैरवी ।
सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालसङ्कर्षणी तथा ॥ 10 ॥
भावार्थ:
उन्मत्त भैरवी देवी मेरे पैरों के अँगुलियों तक रक्षा करें,
और कालसंक्षर्षिणी देवी मेरे सम्पूर्ण शरीर की सदा रक्षा करें।
युक्तायुक्तस्थितं नित्यं सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
सर्वे समर्थ्यसंयुक्तं भक्तरक्षणतत्परम् ॥ 11 ॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति इस कवच का नित्य जप करता है,
वह सभी पापों से मुक्त होता है।
देवी वाराही सदा भक्तों की रक्षा में तत्पर रहती हैं।
समस्तदेवताः सर्वं स्वयं विष्णोः पुरार्धने ।
सर्वशत्रुविनाशाय शूलिना निर्मितं पुरा ॥ 12 ॥
भावार्थ:
यह कवच स्वयं भगवान विष्णु के आदेश से
त्रिशूलधारी भगवान शिव ने रचा था —
जो समस्त शत्रुओं के विनाश के लिए अत्यन्त प्रभावशाली है।
सर्वभक्तजनाश्रित्य सर्वविद्वेषसंहतिः ।
वाराही कवचं नित्यं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ॥ 13 ॥
भावार्थ:
जो भक्त इस वाराही कवच का नित्य त्रिकाल पाठ करता है,
वह सभी द्वेष, भय और शत्रुओं से मुक्त हो जाता है।
तथा विधं भूतगणा न स्पृशन्ति कदाचन ।
आपदः शत्रुचोरादि ग्रहदोषाश्च सम्भवाः ॥ 14 ॥
भावार्थ:
जो इस कवच का पाठ करता है,
उसे किसी प्रकार का भूत, ग्रहदोष, शत्रु या चोरी का भय नहीं रहता।
माता पुत्रं यथा वत्सं धेनुः पक्ष्मेव लोचनम् ।
तथाङ्गमेव वाराही रक्षारक्षति सर्वदा ॥ 15 ॥
भावार्थ:
जैसे माता अपने पुत्र की रक्षा करती है,
गाय अपने बछड़े की रक्षा करती है,
और पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं —
उसी प्रकार देवी वाराही भक्त के शरीर की सदा रक्षा करती हैं।
इति श्री रुद्रयामल तंत्रे श्री वाराही कवचं सम्पूर्णम् ॥
इस प्रकार श्री रुद्रयामल तंत्र में वर्णित श्री वाराही कवच सम्पूर्ण हुआ।